Tuesday, July 3, 2012

एक मनोवैज्ञानिक अभियान

 दोस्तों , कुछ दिनों पहले संयोगवश मेरी मुलाक़ात चिकित्सा वैज्ञानिक श्री सुबोध कुमार से हुई ,इस विषय में मेरी रूचि भी है अतः बात चीत का सिलसिला चल पड़ा , बात चीत के दौरान उन्होंने एक केस की चर्चा की जिसे सुनने के बाद मुझे लगा की ऐसी बातें तो अक्सर exams के results आने के बाद हमें सुनने को मिलती हैं , तो मैंने आप सब के साथ इसे बांटने के बारे सोचा| उन्होंने बताया की एक लड़की ने शायद आत्महत्या की कोशिश की थी , वजह थी परीक्षा में कम नंबर , मुझे ठीक से याद तो नहीं पर शायद उसके 56 % नंबर आये थे, वो बहुत दुखी थी , जब सुबोध जी ने उससे पूछा की वो कितना expect कर रही थी तो शायद उसने कहा कम से कम 85% , तो ये जांचने के लिए की वाकई जितना वो चाह रही थी उतने नंबर उसे आ सकते थे सुबोध जी ने उससे एक बड़ा हल्का सा गणित का प्रश्न पूछा की यदि 435 को 100 से भाग दिया जाये तो उत्तर क्या होगा ...... और जैसा सुबोध जी ने बताया की उस लड़की को 7 मिनट लगे इसका हल निकालने में और फिर भी वो सही जवाब नही दे सकी ... वो लड़की depression में थी .... और बिना किसी दवाई के मनोवैज्ञानिक इलाज से वो बिलकुल ठीक हो गयी| मुझे ये बात जान कर बहुत ख़ुशी हुई की इस तरह के और भी बहुत से प्रोब्लम्स का सामना कर रहे स्टुडेंट्स,कामकाजी लोग और रिटायर्ड लोगों के लिए सुबोध जी ने निजी तौर पर एक हेल्पलाइन चला रखी है, जो की उनका अपना निजी मोबाईल नंबर है साथ ही अपने स्तर से उन्होंने एक अभियान भी छेड़ रखा है जिसमे वो व्यवहार या आदतों से होने वाली समस्या , उदासी या अकेलापन , किसी भी किस्म का तनाव या depression , परिवार के सदस्यों की समस्या और इस तरह की कई और समस्याओं का समाधान बताते हैं .....मुझे ये बताते हुए ख़ुशी हो रही है की अब मैं भी अपने स्तर से उनके इस अभियान से जुड़ गया हूँ .... आप सब का साथ और समर्थन चाहिए ताकि बिना दवाई के ठीक हो जाने वाली बहुत सारी समस्याओं का समाधान हो सके जो जानकारी या इच्छाशक्ति की कमी के कारण बाद में गंभीर रूप धारण कर लेती है ......इन मुद्दों पर अधिक जानकारी के लिए आप मुझसे संपर्क कर सकते हैं |

Saturday, November 12, 2011

रामधनी की आमदनी...!

काका रामधनी पहले तो गरीब रहे लेकिन अब गरीब नहीं हैं ,... अरे भाई अचानक कोई गड़ा खजाना हाथ नहीं लगा  और ना ही किस्मत इतनी धारदार है की कौन बनेगा करोडपति से पैसे जीत लायें ,.... और वैसे भी काका जब छोटे थे तो मनमोहन सिंह की सरकार तो थी कि नहीं शिक्षा के अधिकार के तहत लिख पढ़ लेते,... तो कुल मिला के बात इतनी है की काका को अब कागज पे अक्षर दिखाओ चाहे खेत में भैंस बात एक ही है | खैर....तो आखिर काका की गरीबी दूर कैसे हुई ? असल में ये तो खुद काका को भी पता नहीं चला की उनकी गरीबी दूर कैसे हुई.... हाँ उनको ये ज़रूर पता है कि एक दिन सुबह जब सेठ जी के खेत पे मजूरी करने गए थे तो गरीब थे ,.. शाम को जैसे ही सेठ जी ने मजूरी के ३० रूपए पकडाए झटके में काका को पता चला कि वो तो गरीबी रेखा से ४ रूपए ऊपर उठ चुके हैं ,... सेठ जी ने मुस्काते हुए कहा कि "मोंटेक सिंह जी को धन्यवाद दो , तुम्हारी गरीबी तो दूर हो गयी  और अगर सरकार ने चाहा तो जल्दी ही अमीर भी बन जाओगे " |

डिटेल इन्वेस्टिगेशन के बाद काका को पता चला कि योजना आयोग ने अदालत को यह बताया है कि जो भी गाँव में प्रतिदिन २६ रूपए से ज्यादा खर्च करेगा वो गरीब नहीं कहलायेगा इसका मतलब गरीबी के नाम पर मिलने वाली सारी सुविधाएँ बंद !  भाई  जब काका गरीब रहे ही नहीं तो सुविधाएँ काहे कि , सरकार अब तक जो इन पर खर्च कर रही थी अब वो गरीबों (आयोग की अगली रिपोर्ट आने तक जो गरीब है) पर खर्च किया जायेगा | इतना पता लगते ही काका का दिमाग तो ऐसे चक्कर पे चक्कर खाने लगा , जैसे कांग्रेसी नेता १० जनपथ के | बहरहाल काका तो ये मानने को तैयार नहीं हुए कि उनकी गरीबी दूर हो गयी और एक दिन सेठ जी के मुनीम जी से जैसे कहा मुनीम जी ने हड़का दिया " पगला गए हो का रामधनी ? अरे सरकार ने सुन लिया तो गजब हो जायेगा , पकडे जाओगे कि सरकारी नीति का विरोध कर रहा था , सरकार की बात नहीं माना... मतलब सरकार से बगावत ? राम ! राम ! अरे मूरख ! ऊपर सरकार बैठी है सरकार , अगर उ कह दे कि तुम रामधनी नहीं चम्पाकली हो तो तुम्हे क्या सारी दुनिया को मानना पड़ेगा , और हाँ सरकार को तुम गुमराह तो कर नहीं सकते काहे कि सरकार के पास एक एक पैसे का हिसाब रहता है , तुम्हारे जेब में कितना है , तुम्हारे घर में कितना है, तुम्हारे बैंक में कितना है | ये तो कुछ भी नहीं अगर जो स्वित्ज़रलैंड में भी पैसा छुपा के रखोगे तो उसका हिसाब भी निकाल लेती है सरकार , अब ये उनकी मर्जी है कि किसी का नाम बताये या नहीं , तो अगर सरकार ने कह दिया कि तुम गरीब नहीं रहे तो मतलब नहीं रहे कोई बहाना नहीं चलेगा समझे ?  काका ने एक पुरवैया सांस अन्दर खींची और मन ही मन लगे मुनीम को कोसने " मुआ ३० रूपए दे के स्वित्ज़रलैंड में अकाउंट खुलवा रहा है ,इसका बस चले तो इनकम टैक्स का छापा पडवा दे मेरे झोपड़े में " | लेकिन काका ने भी ठान लिया कि गरीब हैं तो गरीब ही बने रहेंगे सो इनकम के ३० रूपए में से ५ रूपए ऐसी जगह छुपाना चालू किया की सीआईडी, सीबीआई और एफ.बी.आई  मिल के भी नहीं ढूंढ सकते थे तो बचे कितने रूपए ? २५ ! यानी पूरा खर्चा होने पर भी 'एक्सपेंडिचर ऑन रिकोर्ड' कितना हुआ ?? २५ रूपये ! यानी तय सीमा के अन्दर मतलब काका गरीब के गरीब बने रहे ....| दिन बीतने लगे अब काका खुश थे वो भी इस बात से की गरीबी बरकरार है ....|

अचानक एक दिन काका ने चमत्कारी बात सुनी कि कोई युवराज हैं.... यहाँ वहां घूमते रहते हैं और किसी गरीब के यहाँ रुक कर खाना खा लेते हैं... जिसके यहाँ भी खाना खाया फिर वो गरीब नहीं रहा ...अगले दिन अखबार में फोटो छपती है सो अलग ....और कल युवराज इसी गाँव में आ रहे हैं ....| रामधनी तो सोच में पड़ गए की जाने किसके भाग खुलने वाले हैं ...! क्या पता युवराज हैं तो खिलाने वाले का खाना और गरीबी पे तरस खा के कुछ रूपए , हीरे , जवाहरात दिए जाते होंगे ! खैर अगले दिन शाम को भारी भीड़ के अन्दर काका भी गए युवराज के दर्शन करने ...आहा हा हा ! क्या वेशभूषा है श्वेत वस्त्र एवं चश्माधारी, चेहरे पर लाल रंग की अनोखी चमक बस ...अब क्या कहा जाये , अब तो एक ही चाह रह गयी काका के मन में कि... युवराज बस हमारे यहाँ भोजन कर लें .....| लो मन की बात पूरी खत्म भी नहीं हुई थी की युवराज की नज़र काका पर पड़ी और तय हो गया की आज युवराज रामधनी के यहाँ भोजन करेंगे | काका के तो मनो पंख लग गए मन उड़ान भरने लगा ...जाने कितना पैसा देंगे?? हीरे जवाहरात दे दिए तो एक्सचेंज कहाँ करवाएंगे ? हाँ सेठ जी से कैश करवा लूँगा ......और हद तो तब हो गयी काका की ....जब चलते चलते मुनीम जी से स्वित्ज़रलैंड वाले बैंक का नाम और जाने वाली ट्रेन के बारे में पूछने लगे | खैर युवराज की मेहमान नवाजी में कोई कमी ना रह जाये सो काका छुपाये हुए पैसे भी निकाल के ले आये ....काकी और बच्चो ने मिल कर युवराज को खिलाया ....युवराज ने भी अपनी पूरी गरिमामय  उपस्थिति दर्ज करवाई ,फोटो खिंचवाया , काका के पूरे परिवार को अपना परिवार बता कर पारिवारिक सदस्य की तरह बिना शर्माए ८ रोटियां दबा गए और जाते जाते काका के पूरे परिवार को शुभकामनाएं थमा गए | काका के तो कुछ समझ में नहीं आ रहा था की युवराज बिना कुछ दिए चले गए पर काका ने तो सुना था की जिसके यहाँ खाते हैं उसकी गरीबी दूर हो जाती है ,.. इनकी गरीबी तो दूर की बात छुपाये हुए पैसे भी हाथ से गये ...लेकिन उम्मीद पर तो दुनिया टिकी है , काका भी सारी रात उम्मीद का दामन पकड़ के बैठे रहे कि क्या पता सुबह अपने किसी मुलाजिम के हांथों कुछ भिजवा दें ...पर होनी को तो होना ही रहता है |

अगले दिन ले आये अखबार कि कहीं कोई इनाम का ऐलान किया हो ...फोटो तो पहचान गए पर लिखा क्या था पढवाने के लिए पहुंचे मुनीम के पास , मुनीम ने पढ़ा और लगा लोट लोट के हंसने , कहा ''रामधनी ...लो पक्के से मिट गयी तुम्हारी गरीबी , अब तो अखबार में भी छप गया" | काका की आँखों में अमीरी की चमक आ गयी.... लगा कोई खेत खलिहान नाम कर दिया होगा युवराज ने ... पर मुनीम ने बताया की अखबार में छपा है की कल युवराज ने रामधनी के घर भोजन किया भोजन बड़ा स्वादिष्ट था और भोजन पे रामधनी ने ५0 रूपए से ज्यादा का खर्चा किया ....."और लो !! अब तो साबित हो गया रामधनी की तुमने २६ रूपए से ज्यादा का खर्चा किया इसलिए तुम गरीब नहीं हो , और अब तो ये बात सरकार को भी पता चल गयी है ...और छुपाओ पैसे , अब दिमाग में बात गयी की सरकार को गुमराह नहीं कर सकते" |  काका चल पड़े खेतों की तरफ और उनको पता चल गया की युवराज जिसके घर खाना खाते हैं उसकी गरीबी दुनिया के सामने दूर कैसे होती है और अब ये बात उनके समझ में आ रही थी आने वाले समय में गरीबी तो मिट जाएगी पर गरीब .....सिन्धु घाटी सभ्यता के अवशेषों की तरह हमेशा कायम रहेगा  ...........!         

Thursday, September 8, 2011

बिल से निकली बात


अनशन अन्ना ने किया और सेहत सरकार की खराब हो गयी , अन्ना ने तो सरकार की हालत सच में ऐसी कर दी जैसे किसी छोटे बच्चे ने सुबह सुबह खुद को बाथरूम में बंद कर लिया हो और बाहर इंतज़ार कर रहे अपने पिताजी से कह रहा हो की रिपोर्ट कार्ड पर साइन करो वरना दरवाज़ा नहीं खोलूँगा , और मनमोहन सिंह जी की हालत तो बिना ब्रेक की गाडी के उस ड्राइवर जैसी हो गयी है जो लगातार चलता तो जा रहा है मगर उसे ये नहीं मालूम की जाना कहाँ है | खैर राधा नाची तो सही मगर नौ मन तेल की बत्ती जलने बाद , यानी सरकार ने अंततः सिविल सोसाइटी द्वारा प्रस्तावित मांगो में से कुछ पर सहमती जाता दी  और जल्दी से जल्दी बिल को संसद में लाना चाहती है , सरकार शायद इस बात से डर रही है की कहीं स्विस बैंकों को भी लोकपाल के दायरे में लेन की मांग ना उठने लगे , और अगर ऐसा हो भी गया तो कोई बड़ी बात नहीं होगी क्योंकि जनता तो तब भी अन्ना का समर्थन इसी प्रकार करती ही रहेगी , बहरहाल हमे तो अन्ना की सेहत के लिए प्रार्थना के साथ भगवन से इस बात का भी शुक्र मानना चाहिए की एक बार भी ऐसा नहीं हुआ की अनशन पर बैठे अन्ना ने अपनी टीम के किसी सदस्य से बात करने के लिए फोन मिलाया हो और अगला केवल इसलिए बात नहीं कर पाया क्योंकि वो खाना खा रहा था |

वैसे शिवसेना की उस चिट्ठी जिसमे सिविल सोसाइटी के दूसरे सदस्यों को भी बारी बारी  अनशन पर बैठने की बात की गयी थी , उसमे दम हो या ना हो मगर यह बात तो तर्कसंगत व न्यायपूर्ण लगती है की भई ! खाने पीने का मौका तो सबको बराबरी से मिलना ही चाहिए (आशय केवल भोजन से है ) , वैसे जितना दम अन्ना में है लगभग उतनी ही ताकत ५-१० रूपए में बिकने वाली ' मैं अन्ना हूँ' लिखी टोपी में भी है , चाहे खुद पहन लो या दूसरों को पहना दो , और नहीं तो क्या ? एक बार १० रूपए का इन्वेस्टमेंट (भविष्य में होने वाले आन्दोलनों के लिए भी यह सुविधा उपलब्ध) और पूरे आन्दोलन काल में ना तो लोकल बस में टिकट लेने की चिंता नाहीं बिना हेलमेट बिना लाइसेंस और नाही तीन सवारी लिए तेज़ रफ़्तार बाइक पर पकडे जाने का डर , बशर्ते आपने उस टोपी को अपने सर पर बिठा रखा हो , क्या मजाल किसी ट्राफिक वाले की कि आपको टोक भी दे और कहीं गलती से रुकने का इशारा कर दिया तो मचा दो बवाल और बात का क्या है साहब ! मिनटों में रुख बदल लेगी कि और कोई रास्ता ना सूझा तो सरकार पुलिस के ज़रिये अन्ना समर्थकों को रोक कर अन्ना का समर्थन कम करना चाह रही है , और वैसे भी आजकल तो ट्राफिक वालों या पत्रकारों के किसी भी सवाल मसलन " लाइसेंस कहाँ है "? , हेलमेट क्यों नहीं पहना " ? , या " आप लोकपाल बिल के बारे में क्या जानते हैं "? का एक ही सही और असरदार जवाब है - "अन्ना हजारे जिंदाबाद " ! " भारत माता कि जय" ! " वन्दे मातरम् " ! और "इन्कलाब जिंदाबाद " , प्रश्नकर्ता के सारे सवाल धरे के धरे रह जायेंगे और आप सीना चौड़ा कर के अपने रस्ते जा सकेंगे|

 खैर , जनलोकपाल बिल तो आएगा ही साथ ही एक अच्छी बात ये भी हो गयी कि उन स्टुडेंट्स और वैसे लोगों ने भी नित्य रामलीला मैदान में जाकर , शहर भर में भारत का झंडा थामे गाड़ियों से चक्कर काट काट कर , चेहरे पर रंग रोगन करवा कर और भी भिन्न तरीकों से इस आन्दोलन में बढ़ चढ़ कर हिस्सा ले कर प्रायश्चित कर लिया जिन्होंने स्वयं कभी डोनेशन से दाखिला लिया होगा या बगैर वैधानिक प्रक्रिया के गाड़ी चलाने का लाइसेंस लिया होगा , या हो सकता है कि मैं गलत हूँ और ये सब भ्रष्टाचार के तहत ना आता हो , यदि मैं गलत हूँ तो सबसे माफ़ी और भगवान् से सदबुद्धि चाहूँगा साथ ही ईश्वर करे कि भ्रष्टाचारियों के नाक में नकेल कसने वाला जन लोकपाल  बिल जल्दी से जल्दी कानून बन जाये और देश से भ्रष्टाचार का सफाया "हेड एंड शोल्डर्स" से "डैनड्रफ" की तरह हो जाये , पर एक बात मुझे सता रही है कि लोकपाल आने के बाद यदि किसी फ़ोकट बाबू से किसी दफ्तर का चपरासी किसी काम के ५० रूपए मांगता है फ़ोकट बाबू दे देते हैं काम हो जाता है बात दोनों के बीच दफ़न हो जाती है और फ़ोकट बाबू अपने घर चले जाते हैं तो इस भ्रष्टाचार पर लोकपाल जी क्या एक्शन लेंगे इसका कहीं कोई ज़िक्र पूरे मसौदे में मुझे तो नहीं मिला , बहरहाल ईश्वर से प्रार्थना कि अन्ना स्वस्थ रहें , जनलोकपाल बिल जल्दी पास हो, भ्रष्टाचार मिटे और जनता खुशहाल हो |

अन्ना जी जिंदाबाद, अरविन्द केजरीवाल जी जिंदाबाद ,किरण बेदी जी जिंदाबाद ,प्रशांत भूषण जी  जिंदाबाद, शांति भूषण जी जिंदाबाद और कहीं कोई रह ना जाये अतः सारे समर्थक जिंदाबाद | "जय हिंद" !               

Tuesday, April 19, 2011

'पापुलर डेमोक्रेसी'

भारत एक लोकतान्त्रिक देश है इसमें कोई दोमत नहीं है , और ना ही इस बात को बोलने या स्वीकारने में हमे एक पल का भी समय लगता है , पर क्या लोकतंत्र का मौजूदा स्वरुप लोकप्रिय (व्यापक अर्थों में ) है ? अब इस बात पर हामी भरने में यदि सबको नहीं तो भी बहुत सारे लोगों को थोडा समय लगेगा , अब सवाल ये है की समय क्यों लगे भाई ?? जनता की चुनी हुयी सरकार है ! इसी तंत्र में सैकड़ों कल्याणकारी योजनायें चल रही हैं ! आम आदमी के हित में केंद्र और राज्य स्तर पर महत्त्वपूर्ण और लाभकारी कार्य किये जा रहे हैं ! तो ये 'सिस्टम' 'पापुलर' कैसे नहीं  है ?? अगर नहीं होता तो शायद यहाँ भी ट्यूनीशिया , लीबिया , मिस्र आदि देशो से हालात हो जाते, मगर ऐसा कुछ नहीं है, तो अब ये सिस्टम पापुलर है या नहीं इस पर बाद में बात करेंगे पर बंधुओं  ये तो साबित हो गया की ये 'नान पापुलर' नहीं है ! 

आइये अब इसके दूसरे पक्ष पे बात करते  हैं , मैं आज कल दिल्ली में रह रहा हूँ , सियासी राजधानी है भाई ! काम के सिलसिले में स्थानीय यात्राओं , आम-ओ-खास लोगों से यहाँ वहां मुलाकातों के दौरान कई बार मौजूदा हालात के बारे में चर्चा हो जाती है , अभी तक जो बहुमत (लोकतान्त्रिक शब्दावली) प्राप्त हुआ उसमे लोग कुछ खास प्रसन्न नहीं दिखे , तो बुद्धि चक्कर खाने लगी , कि 'सिस्टम' 'नान पापुलर' नहीं है फिर भी लोगों को संतोष क्यों नहीं है ? एक चर्चा के बाद थोड़ी विवेचना की वही आपके सामने रख रहा हूँ ! 

 लोगों के साथ साथ मुझे भी बड़ी प्रसन्नता हुई कि अन्ना हजारे जी जन लोकपाल के लिए अनशन पे बैठे और सरकार ने तुरंत उनकी बात मान ली , ढोल वोल बजे सब खुश हुए , पर उसी समय एक बात 'क्लिक' हुई कि क्या भ्रष्टाचार का विरोध करने के लिए किसी को जान देने कि नौबत का सामना करना पड़ेगा तब सरकार मानेगी ?? वो भी हमारे द्वारा चुनी हुई सरकार ! मैंने सोचा कि ये जन लोकपाल ज़रूरी क्यों है ? इतनी सशक्त न्यायपालिका है , इतनी सक्रिय जाँच एजेंसियां हैं , इतने सजग लोग हैं ( आर टी आई , पी आई एल आदि के सन्दर्भ में ) और अंतिम में यदि ये भी नहीं तो न्यायपालिका के स्वतः संज्ञान लेने का विशेषाधिकार तो है ही फिर क्या ज़रुरत है इसकी ? तो जवाब भी मन से ही आया , 

एक बार पीछे मुड़ के देखता हूँ तो जवाब मिल जाता है , ये सब तो तब भी ऐसे ही थे जब नरसिम्हा राव कि सरकार बचाई गयी थी , मौजूदा ज़मीनी हालात ये है कि शीबू जी तीन बार मुख्यमंत्री बन चुके हैं फिलहाल आराम कर रहे हैं और बेटे को उप मुख्यमंत्री बनवा दिया है, ये तब भी वैसे ही थे जब संसद और मुंबई पर हमला हुआ था , मौजूदा ज़मीनी हालात ये है कि अफज़ल और कसाब दोनों बैठ कर नपी हुई कैलोरी युक्त भोजन कर रहे हैं , ये तब भी वैसे ही थे जब कोड़ा जी ने ४००० हज़ार करोड़ का घोटाला किया और  ये तब भी वैसे ही थे जब देश का सबसे बड़ा घोटाला हुआ , माना कि दोनों हिरासत में हैं मगर इतिहास देख कर तो ये नहीं लगता कि अगर कुछ हुआ भी तो जल्दी हो पायेगा और अगर हो भी गया तो तो वो लाखों करोड़ों रुपये वापस कैसे आयेंगे जो इन महानुभावों ने गायब कर लिए ? चलो ये भी मान लेते हैं कि इन पर कठोर से कठोर कार्यवाही कि जाएगी लेकिन भैया कब की जाएगी ये सवाल है . फाइलें यहाँ से वहां , वहां से यहाँ ' ऑफिस ऑफिस ' के इस खेल में वर्षों निकल जाते हैं और १२१ करोड़ 'मुसद्दी लाल' बेचारे बने रहते हैं , 

वैसे भी कहा जाता है कि 'Justice delayed is justice denied' तब लगा कि  ' अन्ना जी का समर्थन करना उचित है , आवश्यक है और अपरिहार्य है , साथ ही अपने स्तर से भी इस पर कार्य करना होगा  , जो हम नैतिकता का पालन कर के और अपने छोटो या जहाँ भी संभव हो नैतिक शिक्षा का प्रसार कर के कर सकते हैं , वरना हुजूर अगर किसी दफ्तर के चपरासी को आप १०० का नोट देते हैं, वो रख लेता है  और आपका काम हो जाता है तो वहां लोकपाल भी कुछ नहीं कर पाएंगे , तो हमारा लक्ष्य GDH ( Gross Domestic Happiness) सकल राष्ट्रीय ख़ुशी होनी चाहिए , साथ ही मन में अपने ' डेमोक्रेसी' को न केवल 'पापुलर' बनाने का संकल्प होना चाहिए बल्कि इसे बनाना है ' The Most Popular Democracy of The World' .              

Monday, September 13, 2010

तिरेथन भैया.. 'दि रिब्यु मनेजर'|

माँ बाप ने ने बड़े प्यार से नाम रखा था 'त्रेतानाथ' अब गाँव में ई नाम कौन ले? ससुरी मतलब भी तो नहीं पता, सो नाम हो गया 'तिरेथना' गाँव के कुछ लड़के शहर से कमा के लौटे तो 'स्टेंडर' भाषा सीख के आये थे,तो 'स्टेंडर' भाषा में 'तिरेथना' बन गया 'तिरेथन'|शादी ब्याह,दो बच्चे हुए अब गांव के सीनियरों में गिने जाने लगे तो 'तिरेथन' से 'तिरेथन भैया' बन गए| ई तो था तिरेथन भैया के नाम का 'इंट्रोडकसन' अब रहा सवाल काम का,अरे भई मतलब भैया जी काम का करते है? तो बंधुओं भैया जी 'रिब्यु मनेजर'(रिव्यू मैनेजर)हैं, वैसे ये नाम तो हमने भी नया नया सुना है मगर भैया जी तो खुद को यही बताते हैं| वैसे एक और खास बात है भैया जी की, खुद को छोड़ के गांव के सारे लोगों को अनपढ़ गंवार ही समझते हैं|

किसी ने कभी भैया जी से ये पूछने की गुस्ताखी कर दी "भैया जी ई रिब्यु मनेजर का होत है"? बस फिर क्या था लगा दी भैया जी ने झिड़की "धत्त ससुर अनपढ़ गंवार, अरे रिब्यु मनेजर का मतलब होत है जौन आपन 'रिब्यु' माने विचार देत है ओ के रिब्यु मनेजर कहत हैं जैसे हम"| तो बंधुओं तिरेथन भैया आज कल रिब्यु माने अपने विचार देते हैं, फिल्मों पर, राजनीति पर, सामाजिक क्रिया कलापों पर , और विचार देते हैं गाँव के सबसे 'इंटरेस्टिंग' एवं 'इंटरटेनिंग' 'स्पाट' पर यानी की 'भैया की चौपाल' में|अब कल पाँड़े जी ने भैया जी को पूछ कर उकसा दिया...

"भैया जी सुनत हैं दिल्ली में कौनो खेल होवे वाला है, बड़ी हो हल्ला है बाजार में"!

"हाँ ... कामन वेल्थ गेम होत है दिल्ली में"|

"कामन वेल्थ गेम ?? ई कौन खेल है? कब्बो नाम नाही सुना"|

"हाँ ससुर कहाँ से सुनेगा 'मुन्नी बदनाम हुई डार्लिंग तेरे लिए' से फुर्सत मिलेगा तब तो कौनो काम के चीज सुनेगा ??

बहुत बड़ा खेल है, सरकार करावत है"|

"उ तो ठीक है भैया जी मगर ई का मतलब का होत है"?

"पढ़े लिखे के समय तो स्कूल से भाग मास्टर जी की मुर्गी के नीचे से अंडा चुरात रहा.. अब पूछत है मतलब का होत है? अरे ई का मतलब तो ई के नाम में ही है, 'कामन' माने सबका, 'वेल्थ' माने धन,'गेम' माने खेल, मतलब जौन खेल करावे से सरकार में सबके बीच धन का बंटवारा होत है उ के कहत हैं कामन वेल्थ गेम.."|

"लेकिन भैया जी .. ई धन सरकार के कौन देत है "?

"तोहार भौजी देत है और बोल का कर लेगा ... अरे सरकार के धन कौन देगा सरकार अपने ले लेत है फंड में से .. लेकिन धन निकाले खातिर कौनो बहाना होवे के चाही ना ?? तो अबकी ई खेल है बहाना ...धन आएगा, फिर सबमे बटने का खेल होगा ..हो गया ना 'कामन वेल्थ गेम'"|

"लेकिन भैया जी.... कहीं पकड़ा गए तो"?

"अरे ससुर कहा न बहुत बड़ा खेल है ई..तोहार गुल्ली डंडा नाही है की गुल्ली ले के भगा और पकड़ा गया.. खिलाडी कम सरकार ज्यादा खेलेगी, सब इंतजाम पहले ही हो चुका है, अब बताओ चालीस करोड़ का तो खाली गुब्बारा खरीदी है सरकार और सात करोड़ का तौलिया , अरबों के ठेके दिए गए हैं, करोड़ों की सुरक्षा मशीन विदेश से आ रही है, खेल के बाद सरकार को हिसाब देने में कौनो कष्ट थोड़े होगा, बोल देगी की गुब्बारे उड़ गए, तौलिये खिलाडी ले गए, मशीन खराब हो गयी और खुदा न खास्ता खेलों के बाद एक भी स्टेडियम ढह गया तो बस हो समझो अरबों भीतर और नहीं भी ढहा तो कमीशन तो पहले ही आ चुका होगा ...और वैसे भी आज तक कुछ हुआ है इनलोगों को जो अब होगा ?? उ तो बेचारा मधु कोड़ा, निरीह प्राणी... सिपाही था शहीद हो गया लेकिन कुछ दिन रुक जाओ देखना मामला ठंडा होते ही उसको भी बचा लेंगे सब"|

"मान गए भैया जी ई तो सच मुच बहुत बड़ा खेल है, और सरकार भी बहुत चालू है"|

"अरे ढपोरशंख.....! चालू नाही है तो चल कैसे रही है "?

"अच्छा भैया जी....सुना है यमुना में पानी बढ़ गया है दिल्ली में बाढ़ आ गयी है, अगर खेलों तक ऐसे ही पानी बना रहा तो का होगा"?

"अरे ससुर शुभ शुभ बोल ....कहीं कलमाड़ी ने सुन लिया तो तोहके उसी बाढ़ के पानी में डुबो देगा ...वैसे इसका भी इंतज़ाम है सरकार के पास, अगर पानी ऐसे ही बना रहा तो तैराकी का खेल उसी में करवा देगी और बोल देगी की पर्यावरण को समर्पित इस आयोजन को नदी के पानी में करवाया जा रहा है, का पता अगली बार नोबेल शीला जी को ही मिल जाये"!

"का बात है! का बात है! वैसे आपको का लगता है भैया जी अगर कलमाड़ी से ई बाढ़ वाला सवाल पूछा जाये तो का जवाब हो सकता है"?

"का जवाब होगा ... कुछ ऐसा बोल सकते हैं कलमाड़ी साहेब

"या उफनती जमुना का रुख मोड़ देंगे हम,
या तैयारियों के सब रिकार्ड तोड़ देंगे हम,
औ' खेल का आयोजन न कर सके अगर,
हिस्सा ले अध्यक्ष को पद को छोड़ देंगे हम"

"चल पाँड़े अब और सवाल मत पूछ बहुत काम पड़ा है अभी 'दबंग' देखने भी जाना है आखिर उ पर भी तो रिब्यु देना है"|

Thursday, October 22, 2009

पृथक दृष्टिकोण क्यों ??

यह मानव की वैचारिक विविधता ही तो है , जहाँ उग्रवाद , दंगे-फसाद ,गरीबी ,भ्रष्टाचार आदि मुद्दों पर विभिन्न जाति , वर्ग और क्षेत्रिये समूहों की अलग अलग प्रतिक्रियाएं पाई जाती हैं | किसी स्थान पर घटित किसी घटना पर अलग अलग लोगों के अलग अलग दृष्टिकोण होते हैं , आप कहेंगे तो इसमें कौन सी ख़ास बात है , हर आदमी अपने अपने हिसाब से सोचता है तो विचारों में विविधता तो आयेगी ही | पर प्रश्न भी तो यही है की एक ही घटना या एक ही मुद्दे पर पृथक दृष्टिकोण क्यों ?
तो इसका उत्तर है घटना से आदमी पर पड़ने वाले प्रभाव या यों कहें की घटना या किसी मुद्दे से सरोकार | मतलब?? मतलब यह की कौन सी घटना या कौन सा मुद्दा हमारे लिए कितना महत्वपूर्ण है और वह किस प्रकार हमारे जीवन पर प्रभाव डाल सकता है | बस , यही हमारी सोच में अंतर का कारण है..| जो माध्यम वर्गीय लोग हैं उनके लिए सरोकारों का दायरा व्यापक होता है क्योंकि उनकी सामाजिक भूमिका में मूल्यों , संस्थाओं और प्रक्रियाओं तीनो के स्तर पर सक्रिए योगदान एक बड़ी शर्त होती है | 'आम आदमी ' की संज्ञा से विभूषित माध्यम वर्गीय लोग ही होते हैं , जिन पर किसी भी चीज़ का प्रभाव सबसे अधिक पड़ता है , चाहे वो राजनैतिक उठा पटक हो या औद्योगिक हलचल या सामाजिक अशांति , कुछ भी हो एक आम आदमी अपने माथे पर हाथ रख कर सोचने के लिए बाध्य हो जाता है | दूसरी तरफ वंचित जमातों के लोगों के लिए ज़िन्दगी की शर्त इतनी कठिन होती है की उनके लिए रोज़ी रोटी की लडाई से बड़ा सरोकार कुछ और हो ही नहीं पता | रोज़ कमा कर रोज़ खाने वाले किसी व्यक्ति से अगर आप टाटा के कोरस पर अधिग्रहण के ऊपर प्रतिक्रिया लेंगे तो जवाब में शायद वो आपका चेहरा निहारने के अलावा कुछ कह नहीं पायेगा , क्योंकि उसके लिए इस बात से कहीं अधिक महत्वपूर्ण कल की मजदूरी का सवाल होगा | जंगल में सुबह से तीर धनुष लेकर एक खरगोश के पीछे भागते किसी वनवासी से यदि आप परमाणु समझौते पर प्रतिक्रिया लेना चाहेंगे , तो आपको क्या लगता है उसके लिए कौन सी बात अधिक महत्वपूर्ण होगी , देश का परमाणु करार या खरगोश के भागने की दिशा ? एक कहावत है ' हाथी अपने वज़न से भारी, चींटी अपने वज़न से भारी' | सत्ता व्यवस्था के शिखर पर स्थापित व्यक्तिओं और समूहों की बात करें तो उनके लिए समाज में होने वाली अव्यवस्था के लिए जिम्मेवार कोई घटना तब तक चिंता का कारण नहीं बनती जब तक उनका अपना घर आग के दायरे में न आ जाये , और यह केवल व्यवस्था के शिखर पर विराजमान लोगों के लिए ही नहीं बल्कि उनके लिए भी लागू होता है जो उन आसमानी ऊँचाइयों पर तो नहीं परन्तु सशक्त अवश्य हैं | बाढ़ की मार झेल रहे लोगों की बाढ़ पर प्रतिक्रिया निश्चित रूप से ड्राई फ्रूट खाते हुए बाढ़ क्षेत्र का हवाई मुआयना करते व्यक्तियों से भिन्न होगी क्योंकि बाढ़ का प्रभाव दोनों तरह के लोगों के लिए अलग अलग है | बात केवल बाढ़ या किसी एक समस्या विशेष की नहीं है , बात है समन्वय की | मूल्यों, प्रक्रियाओं, स्थान, काल और परिवेश के समन्वय की , जो व्यक्ति के अनुसार उसकी मानसिकता पर अलग अलग छाप छोड़ती है | इसीलिए मिडिया आदि के ज़रिये पूरे समाज को सूचना मिलने के बावजूद किसी घटना या मुद्दे पर हम एक जैसी प्रतिक्रिया और हस्तक्षेप नहीं देख पाते हैं | साथ ही किसी घटना के बाद बहुत जल्दी सब कुछ शांत हो जाने के हालात की आदत और समझ भी प्रतिक्रियाओं में विविधता पैदा कर देती है | वैसे देखा जाये तो इसके पीछे भी कारण है , भारत में जीवन दृष्टि की अपनी दार्शनिक विविधता है , जिसमे मानव केन्द्रित धारा बहुत प्रबल नहीं है , यहाँ किसी भी घटना या आपदा को लेकर हम दैव और प्रकृति की दुहाई देते हुए अपनी दिनचर्या में लगे रहते हैं और ' मन के हारे हार है मन के जीते जीत ' की बात को सचमुच केवल किताबी बात सिद्ध करने में लगे रहते हैं , जबकि हमारे पास ऐसे उदहारण मौजूद हैं जहाँ अकेले व्यक्ति ने केवल प्रेरणा और मनोबल से पहाड़ काट कर रास्ता बना दिया | कुल मिला कर बात यह हुई की विचार और परिस्थिति का सम्बन्ध खरबूजे की तरह है , ज्यों खरबूजे को देख कर खरबूजा रंग बदलता है , वैसे ही परिस्थिति के अनुसार विचारों में परिवर्तन स्वाभाविक है | इन सब के अलावा एक बात और भी है , जब तक हम दूसरों के भरोसे चुनौतियों से भागते रहेंगे , तब तक चाहे किसी भी वर्ग के हों बस प्रतिक्रिया देने भर ही रह जायेंगे , पर जिस दिन हम आगे बढ़ कर चुनौतियों को स्वीकार कर उनसे पार पाने के लिए प्रयासरत हो जायेंगे उस दिन हमे प्रतिक्रिया देने की ज़रुरत नहीं होगी , उस दिन हमारे कर्मों से प्रतिक्रिया स्वयं बाहर आएगी |