Thursday, October 22, 2009

पृथक दृष्टिकोण क्यों ??

यह मानव की वैचारिक विविधता ही तो है , जहाँ उग्रवाद , दंगे-फसाद ,गरीबी ,भ्रष्टाचार आदि मुद्दों पर विभिन्न जाति , वर्ग और क्षेत्रिये समूहों की अलग अलग प्रतिक्रियाएं पाई जाती हैं | किसी स्थान पर घटित किसी घटना पर अलग अलग लोगों के अलग अलग दृष्टिकोण होते हैं , आप कहेंगे तो इसमें कौन सी ख़ास बात है , हर आदमी अपने अपने हिसाब से सोचता है तो विचारों में विविधता तो आयेगी ही | पर प्रश्न भी तो यही है की एक ही घटना या एक ही मुद्दे पर पृथक दृष्टिकोण क्यों ?
तो इसका उत्तर है घटना से आदमी पर पड़ने वाले प्रभाव या यों कहें की घटना या किसी मुद्दे से सरोकार | मतलब?? मतलब यह की कौन सी घटना या कौन सा मुद्दा हमारे लिए कितना महत्वपूर्ण है और वह किस प्रकार हमारे जीवन पर प्रभाव डाल सकता है | बस , यही हमारी सोच में अंतर का कारण है..| जो माध्यम वर्गीय लोग हैं उनके लिए सरोकारों का दायरा व्यापक होता है क्योंकि उनकी सामाजिक भूमिका में मूल्यों , संस्थाओं और प्रक्रियाओं तीनो के स्तर पर सक्रिए योगदान एक बड़ी शर्त होती है | 'आम आदमी ' की संज्ञा से विभूषित माध्यम वर्गीय लोग ही होते हैं , जिन पर किसी भी चीज़ का प्रभाव सबसे अधिक पड़ता है , चाहे वो राजनैतिक उठा पटक हो या औद्योगिक हलचल या सामाजिक अशांति , कुछ भी हो एक आम आदमी अपने माथे पर हाथ रख कर सोचने के लिए बाध्य हो जाता है | दूसरी तरफ वंचित जमातों के लोगों के लिए ज़िन्दगी की शर्त इतनी कठिन होती है की उनके लिए रोज़ी रोटी की लडाई से बड़ा सरोकार कुछ और हो ही नहीं पता | रोज़ कमा कर रोज़ खाने वाले किसी व्यक्ति से अगर आप टाटा के कोरस पर अधिग्रहण के ऊपर प्रतिक्रिया लेंगे तो जवाब में शायद वो आपका चेहरा निहारने के अलावा कुछ कह नहीं पायेगा , क्योंकि उसके लिए इस बात से कहीं अधिक महत्वपूर्ण कल की मजदूरी का सवाल होगा | जंगल में सुबह से तीर धनुष लेकर एक खरगोश के पीछे भागते किसी वनवासी से यदि आप परमाणु समझौते पर प्रतिक्रिया लेना चाहेंगे , तो आपको क्या लगता है उसके लिए कौन सी बात अधिक महत्वपूर्ण होगी , देश का परमाणु करार या खरगोश के भागने की दिशा ? एक कहावत है ' हाथी अपने वज़न से भारी, चींटी अपने वज़न से भारी' | सत्ता व्यवस्था के शिखर पर स्थापित व्यक्तिओं और समूहों की बात करें तो उनके लिए समाज में होने वाली अव्यवस्था के लिए जिम्मेवार कोई घटना तब तक चिंता का कारण नहीं बनती जब तक उनका अपना घर आग के दायरे में न आ जाये , और यह केवल व्यवस्था के शिखर पर विराजमान लोगों के लिए ही नहीं बल्कि उनके लिए भी लागू होता है जो उन आसमानी ऊँचाइयों पर तो नहीं परन्तु सशक्त अवश्य हैं | बाढ़ की मार झेल रहे लोगों की बाढ़ पर प्रतिक्रिया निश्चित रूप से ड्राई फ्रूट खाते हुए बाढ़ क्षेत्र का हवाई मुआयना करते व्यक्तियों से भिन्न होगी क्योंकि बाढ़ का प्रभाव दोनों तरह के लोगों के लिए अलग अलग है | बात केवल बाढ़ या किसी एक समस्या विशेष की नहीं है , बात है समन्वय की | मूल्यों, प्रक्रियाओं, स्थान, काल और परिवेश के समन्वय की , जो व्यक्ति के अनुसार उसकी मानसिकता पर अलग अलग छाप छोड़ती है | इसीलिए मिडिया आदि के ज़रिये पूरे समाज को सूचना मिलने के बावजूद किसी घटना या मुद्दे पर हम एक जैसी प्रतिक्रिया और हस्तक्षेप नहीं देख पाते हैं | साथ ही किसी घटना के बाद बहुत जल्दी सब कुछ शांत हो जाने के हालात की आदत और समझ भी प्रतिक्रियाओं में विविधता पैदा कर देती है | वैसे देखा जाये तो इसके पीछे भी कारण है , भारत में जीवन दृष्टि की अपनी दार्शनिक विविधता है , जिसमे मानव केन्द्रित धारा बहुत प्रबल नहीं है , यहाँ किसी भी घटना या आपदा को लेकर हम दैव और प्रकृति की दुहाई देते हुए अपनी दिनचर्या में लगे रहते हैं और ' मन के हारे हार है मन के जीते जीत ' की बात को सचमुच केवल किताबी बात सिद्ध करने में लगे रहते हैं , जबकि हमारे पास ऐसे उदहारण मौजूद हैं जहाँ अकेले व्यक्ति ने केवल प्रेरणा और मनोबल से पहाड़ काट कर रास्ता बना दिया | कुल मिला कर बात यह हुई की विचार और परिस्थिति का सम्बन्ध खरबूजे की तरह है , ज्यों खरबूजे को देख कर खरबूजा रंग बदलता है , वैसे ही परिस्थिति के अनुसार विचारों में परिवर्तन स्वाभाविक है | इन सब के अलावा एक बात और भी है , जब तक हम दूसरों के भरोसे चुनौतियों से भागते रहेंगे , तब तक चाहे किसी भी वर्ग के हों बस प्रतिक्रिया देने भर ही रह जायेंगे , पर जिस दिन हम आगे बढ़ कर चुनौतियों को स्वीकार कर उनसे पार पाने के लिए प्रयासरत हो जायेंगे उस दिन हमे प्रतिक्रिया देने की ज़रुरत नहीं होगी , उस दिन हमारे कर्मों से प्रतिक्रिया स्वयं बाहर आएगी |