Saturday, November 12, 2011

रामधनी की आमदनी...!

काका रामधनी पहले तो गरीब रहे लेकिन अब गरीब नहीं हैं ,... अरे भाई अचानक कोई गड़ा खजाना हाथ नहीं लगा  और ना ही किस्मत इतनी धारदार है की कौन बनेगा करोडपति से पैसे जीत लायें ,.... और वैसे भी काका जब छोटे थे तो मनमोहन सिंह की सरकार तो थी कि नहीं शिक्षा के अधिकार के तहत लिख पढ़ लेते,... तो कुल मिला के बात इतनी है की काका को अब कागज पे अक्षर दिखाओ चाहे खेत में भैंस बात एक ही है | खैर....तो आखिर काका की गरीबी दूर कैसे हुई ? असल में ये तो खुद काका को भी पता नहीं चला की उनकी गरीबी दूर कैसे हुई.... हाँ उनको ये ज़रूर पता है कि एक दिन सुबह जब सेठ जी के खेत पे मजूरी करने गए थे तो गरीब थे ,.. शाम को जैसे ही सेठ जी ने मजूरी के ३० रूपए पकडाए झटके में काका को पता चला कि वो तो गरीबी रेखा से ४ रूपए ऊपर उठ चुके हैं ,... सेठ जी ने मुस्काते हुए कहा कि "मोंटेक सिंह जी को धन्यवाद दो , तुम्हारी गरीबी तो दूर हो गयी  और अगर सरकार ने चाहा तो जल्दी ही अमीर भी बन जाओगे " |

डिटेल इन्वेस्टिगेशन के बाद काका को पता चला कि योजना आयोग ने अदालत को यह बताया है कि जो भी गाँव में प्रतिदिन २६ रूपए से ज्यादा खर्च करेगा वो गरीब नहीं कहलायेगा इसका मतलब गरीबी के नाम पर मिलने वाली सारी सुविधाएँ बंद !  भाई  जब काका गरीब रहे ही नहीं तो सुविधाएँ काहे कि , सरकार अब तक जो इन पर खर्च कर रही थी अब वो गरीबों (आयोग की अगली रिपोर्ट आने तक जो गरीब है) पर खर्च किया जायेगा | इतना पता लगते ही काका का दिमाग तो ऐसे चक्कर पे चक्कर खाने लगा , जैसे कांग्रेसी नेता १० जनपथ के | बहरहाल काका तो ये मानने को तैयार नहीं हुए कि उनकी गरीबी दूर हो गयी और एक दिन सेठ जी के मुनीम जी से जैसे कहा मुनीम जी ने हड़का दिया " पगला गए हो का रामधनी ? अरे सरकार ने सुन लिया तो गजब हो जायेगा , पकडे जाओगे कि सरकारी नीति का विरोध कर रहा था , सरकार की बात नहीं माना... मतलब सरकार से बगावत ? राम ! राम ! अरे मूरख ! ऊपर सरकार बैठी है सरकार , अगर उ कह दे कि तुम रामधनी नहीं चम्पाकली हो तो तुम्हे क्या सारी दुनिया को मानना पड़ेगा , और हाँ सरकार को तुम गुमराह तो कर नहीं सकते काहे कि सरकार के पास एक एक पैसे का हिसाब रहता है , तुम्हारे जेब में कितना है , तुम्हारे घर में कितना है, तुम्हारे बैंक में कितना है | ये तो कुछ भी नहीं अगर जो स्वित्ज़रलैंड में भी पैसा छुपा के रखोगे तो उसका हिसाब भी निकाल लेती है सरकार , अब ये उनकी मर्जी है कि किसी का नाम बताये या नहीं , तो अगर सरकार ने कह दिया कि तुम गरीब नहीं रहे तो मतलब नहीं रहे कोई बहाना नहीं चलेगा समझे ?  काका ने एक पुरवैया सांस अन्दर खींची और मन ही मन लगे मुनीम को कोसने " मुआ ३० रूपए दे के स्वित्ज़रलैंड में अकाउंट खुलवा रहा है ,इसका बस चले तो इनकम टैक्स का छापा पडवा दे मेरे झोपड़े में " | लेकिन काका ने भी ठान लिया कि गरीब हैं तो गरीब ही बने रहेंगे सो इनकम के ३० रूपए में से ५ रूपए ऐसी जगह छुपाना चालू किया की सीआईडी, सीबीआई और एफ.बी.आई  मिल के भी नहीं ढूंढ सकते थे तो बचे कितने रूपए ? २५ ! यानी पूरा खर्चा होने पर भी 'एक्सपेंडिचर ऑन रिकोर्ड' कितना हुआ ?? २५ रूपये ! यानी तय सीमा के अन्दर मतलब काका गरीब के गरीब बने रहे ....| दिन बीतने लगे अब काका खुश थे वो भी इस बात से की गरीबी बरकरार है ....|

अचानक एक दिन काका ने चमत्कारी बात सुनी कि कोई युवराज हैं.... यहाँ वहां घूमते रहते हैं और किसी गरीब के यहाँ रुक कर खाना खा लेते हैं... जिसके यहाँ भी खाना खाया फिर वो गरीब नहीं रहा ...अगले दिन अखबार में फोटो छपती है सो अलग ....और कल युवराज इसी गाँव में आ रहे हैं ....| रामधनी तो सोच में पड़ गए की जाने किसके भाग खुलने वाले हैं ...! क्या पता युवराज हैं तो खिलाने वाले का खाना और गरीबी पे तरस खा के कुछ रूपए , हीरे , जवाहरात दिए जाते होंगे ! खैर अगले दिन शाम को भारी भीड़ के अन्दर काका भी गए युवराज के दर्शन करने ...आहा हा हा ! क्या वेशभूषा है श्वेत वस्त्र एवं चश्माधारी, चेहरे पर लाल रंग की अनोखी चमक बस ...अब क्या कहा जाये , अब तो एक ही चाह रह गयी काका के मन में कि... युवराज बस हमारे यहाँ भोजन कर लें .....| लो मन की बात पूरी खत्म भी नहीं हुई थी की युवराज की नज़र काका पर पड़ी और तय हो गया की आज युवराज रामधनी के यहाँ भोजन करेंगे | काका के तो मनो पंख लग गए मन उड़ान भरने लगा ...जाने कितना पैसा देंगे?? हीरे जवाहरात दे दिए तो एक्सचेंज कहाँ करवाएंगे ? हाँ सेठ जी से कैश करवा लूँगा ......और हद तो तब हो गयी काका की ....जब चलते चलते मुनीम जी से स्वित्ज़रलैंड वाले बैंक का नाम और जाने वाली ट्रेन के बारे में पूछने लगे | खैर युवराज की मेहमान नवाजी में कोई कमी ना रह जाये सो काका छुपाये हुए पैसे भी निकाल के ले आये ....काकी और बच्चो ने मिल कर युवराज को खिलाया ....युवराज ने भी अपनी पूरी गरिमामय  उपस्थिति दर्ज करवाई ,फोटो खिंचवाया , काका के पूरे परिवार को अपना परिवार बता कर पारिवारिक सदस्य की तरह बिना शर्माए ८ रोटियां दबा गए और जाते जाते काका के पूरे परिवार को शुभकामनाएं थमा गए | काका के तो कुछ समझ में नहीं आ रहा था की युवराज बिना कुछ दिए चले गए पर काका ने तो सुना था की जिसके यहाँ खाते हैं उसकी गरीबी दूर हो जाती है ,.. इनकी गरीबी तो दूर की बात छुपाये हुए पैसे भी हाथ से गये ...लेकिन उम्मीद पर तो दुनिया टिकी है , काका भी सारी रात उम्मीद का दामन पकड़ के बैठे रहे कि क्या पता सुबह अपने किसी मुलाजिम के हांथों कुछ भिजवा दें ...पर होनी को तो होना ही रहता है |

अगले दिन ले आये अखबार कि कहीं कोई इनाम का ऐलान किया हो ...फोटो तो पहचान गए पर लिखा क्या था पढवाने के लिए पहुंचे मुनीम के पास , मुनीम ने पढ़ा और लगा लोट लोट के हंसने , कहा ''रामधनी ...लो पक्के से मिट गयी तुम्हारी गरीबी , अब तो अखबार में भी छप गया" | काका की आँखों में अमीरी की चमक आ गयी.... लगा कोई खेत खलिहान नाम कर दिया होगा युवराज ने ... पर मुनीम ने बताया की अखबार में छपा है की कल युवराज ने रामधनी के घर भोजन किया भोजन बड़ा स्वादिष्ट था और भोजन पे रामधनी ने ५0 रूपए से ज्यादा का खर्चा किया ....."और लो !! अब तो साबित हो गया रामधनी की तुमने २६ रूपए से ज्यादा का खर्चा किया इसलिए तुम गरीब नहीं हो , और अब तो ये बात सरकार को भी पता चल गयी है ...और छुपाओ पैसे , अब दिमाग में बात गयी की सरकार को गुमराह नहीं कर सकते" |  काका चल पड़े खेतों की तरफ और उनको पता चल गया की युवराज जिसके घर खाना खाते हैं उसकी गरीबी दुनिया के सामने दूर कैसे होती है और अब ये बात उनके समझ में आ रही थी आने वाले समय में गरीबी तो मिट जाएगी पर गरीब .....सिन्धु घाटी सभ्यता के अवशेषों की तरह हमेशा कायम रहेगा  ...........!         

Thursday, September 8, 2011

बिल से निकली बात


अनशन अन्ना ने किया और सेहत सरकार की खराब हो गयी , अन्ना ने तो सरकार की हालत सच में ऐसी कर दी जैसे किसी छोटे बच्चे ने सुबह सुबह खुद को बाथरूम में बंद कर लिया हो और बाहर इंतज़ार कर रहे अपने पिताजी से कह रहा हो की रिपोर्ट कार्ड पर साइन करो वरना दरवाज़ा नहीं खोलूँगा , और मनमोहन सिंह जी की हालत तो बिना ब्रेक की गाडी के उस ड्राइवर जैसी हो गयी है जो लगातार चलता तो जा रहा है मगर उसे ये नहीं मालूम की जाना कहाँ है | खैर राधा नाची तो सही मगर नौ मन तेल की बत्ती जलने बाद , यानी सरकार ने अंततः सिविल सोसाइटी द्वारा प्रस्तावित मांगो में से कुछ पर सहमती जाता दी  और जल्दी से जल्दी बिल को संसद में लाना चाहती है , सरकार शायद इस बात से डर रही है की कहीं स्विस बैंकों को भी लोकपाल के दायरे में लेन की मांग ना उठने लगे , और अगर ऐसा हो भी गया तो कोई बड़ी बात नहीं होगी क्योंकि जनता तो तब भी अन्ना का समर्थन इसी प्रकार करती ही रहेगी , बहरहाल हमे तो अन्ना की सेहत के लिए प्रार्थना के साथ भगवन से इस बात का भी शुक्र मानना चाहिए की एक बार भी ऐसा नहीं हुआ की अनशन पर बैठे अन्ना ने अपनी टीम के किसी सदस्य से बात करने के लिए फोन मिलाया हो और अगला केवल इसलिए बात नहीं कर पाया क्योंकि वो खाना खा रहा था |

वैसे शिवसेना की उस चिट्ठी जिसमे सिविल सोसाइटी के दूसरे सदस्यों को भी बारी बारी  अनशन पर बैठने की बात की गयी थी , उसमे दम हो या ना हो मगर यह बात तो तर्कसंगत व न्यायपूर्ण लगती है की भई ! खाने पीने का मौका तो सबको बराबरी से मिलना ही चाहिए (आशय केवल भोजन से है ) , वैसे जितना दम अन्ना में है लगभग उतनी ही ताकत ५-१० रूपए में बिकने वाली ' मैं अन्ना हूँ' लिखी टोपी में भी है , चाहे खुद पहन लो या दूसरों को पहना दो , और नहीं तो क्या ? एक बार १० रूपए का इन्वेस्टमेंट (भविष्य में होने वाले आन्दोलनों के लिए भी यह सुविधा उपलब्ध) और पूरे आन्दोलन काल में ना तो लोकल बस में टिकट लेने की चिंता नाहीं बिना हेलमेट बिना लाइसेंस और नाही तीन सवारी लिए तेज़ रफ़्तार बाइक पर पकडे जाने का डर , बशर्ते आपने उस टोपी को अपने सर पर बिठा रखा हो , क्या मजाल किसी ट्राफिक वाले की कि आपको टोक भी दे और कहीं गलती से रुकने का इशारा कर दिया तो मचा दो बवाल और बात का क्या है साहब ! मिनटों में रुख बदल लेगी कि और कोई रास्ता ना सूझा तो सरकार पुलिस के ज़रिये अन्ना समर्थकों को रोक कर अन्ना का समर्थन कम करना चाह रही है , और वैसे भी आजकल तो ट्राफिक वालों या पत्रकारों के किसी भी सवाल मसलन " लाइसेंस कहाँ है "? , हेलमेट क्यों नहीं पहना " ? , या " आप लोकपाल बिल के बारे में क्या जानते हैं "? का एक ही सही और असरदार जवाब है - "अन्ना हजारे जिंदाबाद " ! " भारत माता कि जय" ! " वन्दे मातरम् " ! और "इन्कलाब जिंदाबाद " , प्रश्नकर्ता के सारे सवाल धरे के धरे रह जायेंगे और आप सीना चौड़ा कर के अपने रस्ते जा सकेंगे|

 खैर , जनलोकपाल बिल तो आएगा ही साथ ही एक अच्छी बात ये भी हो गयी कि उन स्टुडेंट्स और वैसे लोगों ने भी नित्य रामलीला मैदान में जाकर , शहर भर में भारत का झंडा थामे गाड़ियों से चक्कर काट काट कर , चेहरे पर रंग रोगन करवा कर और भी भिन्न तरीकों से इस आन्दोलन में बढ़ चढ़ कर हिस्सा ले कर प्रायश्चित कर लिया जिन्होंने स्वयं कभी डोनेशन से दाखिला लिया होगा या बगैर वैधानिक प्रक्रिया के गाड़ी चलाने का लाइसेंस लिया होगा , या हो सकता है कि मैं गलत हूँ और ये सब भ्रष्टाचार के तहत ना आता हो , यदि मैं गलत हूँ तो सबसे माफ़ी और भगवान् से सदबुद्धि चाहूँगा साथ ही ईश्वर करे कि भ्रष्टाचारियों के नाक में नकेल कसने वाला जन लोकपाल  बिल जल्दी से जल्दी कानून बन जाये और देश से भ्रष्टाचार का सफाया "हेड एंड शोल्डर्स" से "डैनड्रफ" की तरह हो जाये , पर एक बात मुझे सता रही है कि लोकपाल आने के बाद यदि किसी फ़ोकट बाबू से किसी दफ्तर का चपरासी किसी काम के ५० रूपए मांगता है फ़ोकट बाबू दे देते हैं काम हो जाता है बात दोनों के बीच दफ़न हो जाती है और फ़ोकट बाबू अपने घर चले जाते हैं तो इस भ्रष्टाचार पर लोकपाल जी क्या एक्शन लेंगे इसका कहीं कोई ज़िक्र पूरे मसौदे में मुझे तो नहीं मिला , बहरहाल ईश्वर से प्रार्थना कि अन्ना स्वस्थ रहें , जनलोकपाल बिल जल्दी पास हो, भ्रष्टाचार मिटे और जनता खुशहाल हो |

अन्ना जी जिंदाबाद, अरविन्द केजरीवाल जी जिंदाबाद ,किरण बेदी जी जिंदाबाद ,प्रशांत भूषण जी  जिंदाबाद, शांति भूषण जी जिंदाबाद और कहीं कोई रह ना जाये अतः सारे समर्थक जिंदाबाद | "जय हिंद" !               

Tuesday, April 19, 2011

'पापुलर डेमोक्रेसी'

भारत एक लोकतान्त्रिक देश है इसमें कोई दोमत नहीं है , और ना ही इस बात को बोलने या स्वीकारने में हमे एक पल का भी समय लगता है , पर क्या लोकतंत्र का मौजूदा स्वरुप लोकप्रिय (व्यापक अर्थों में ) है ? अब इस बात पर हामी भरने में यदि सबको नहीं तो भी बहुत सारे लोगों को थोडा समय लगेगा , अब सवाल ये है की समय क्यों लगे भाई ?? जनता की चुनी हुयी सरकार है ! इसी तंत्र में सैकड़ों कल्याणकारी योजनायें चल रही हैं ! आम आदमी के हित में केंद्र और राज्य स्तर पर महत्त्वपूर्ण और लाभकारी कार्य किये जा रहे हैं ! तो ये 'सिस्टम' 'पापुलर' कैसे नहीं  है ?? अगर नहीं होता तो शायद यहाँ भी ट्यूनीशिया , लीबिया , मिस्र आदि देशो से हालात हो जाते, मगर ऐसा कुछ नहीं है, तो अब ये सिस्टम पापुलर है या नहीं इस पर बाद में बात करेंगे पर बंधुओं  ये तो साबित हो गया की ये 'नान पापुलर' नहीं है ! 

आइये अब इसके दूसरे पक्ष पे बात करते  हैं , मैं आज कल दिल्ली में रह रहा हूँ , सियासी राजधानी है भाई ! काम के सिलसिले में स्थानीय यात्राओं , आम-ओ-खास लोगों से यहाँ वहां मुलाकातों के दौरान कई बार मौजूदा हालात के बारे में चर्चा हो जाती है , अभी तक जो बहुमत (लोकतान्त्रिक शब्दावली) प्राप्त हुआ उसमे लोग कुछ खास प्रसन्न नहीं दिखे , तो बुद्धि चक्कर खाने लगी , कि 'सिस्टम' 'नान पापुलर' नहीं है फिर भी लोगों को संतोष क्यों नहीं है ? एक चर्चा के बाद थोड़ी विवेचना की वही आपके सामने रख रहा हूँ ! 

 लोगों के साथ साथ मुझे भी बड़ी प्रसन्नता हुई कि अन्ना हजारे जी जन लोकपाल के लिए अनशन पे बैठे और सरकार ने तुरंत उनकी बात मान ली , ढोल वोल बजे सब खुश हुए , पर उसी समय एक बात 'क्लिक' हुई कि क्या भ्रष्टाचार का विरोध करने के लिए किसी को जान देने कि नौबत का सामना करना पड़ेगा तब सरकार मानेगी ?? वो भी हमारे द्वारा चुनी हुई सरकार ! मैंने सोचा कि ये जन लोकपाल ज़रूरी क्यों है ? इतनी सशक्त न्यायपालिका है , इतनी सक्रिय जाँच एजेंसियां हैं , इतने सजग लोग हैं ( आर टी आई , पी आई एल आदि के सन्दर्भ में ) और अंतिम में यदि ये भी नहीं तो न्यायपालिका के स्वतः संज्ञान लेने का विशेषाधिकार तो है ही फिर क्या ज़रुरत है इसकी ? तो जवाब भी मन से ही आया , 

एक बार पीछे मुड़ के देखता हूँ तो जवाब मिल जाता है , ये सब तो तब भी ऐसे ही थे जब नरसिम्हा राव कि सरकार बचाई गयी थी , मौजूदा ज़मीनी हालात ये है कि शीबू जी तीन बार मुख्यमंत्री बन चुके हैं फिलहाल आराम कर रहे हैं और बेटे को उप मुख्यमंत्री बनवा दिया है, ये तब भी वैसे ही थे जब संसद और मुंबई पर हमला हुआ था , मौजूदा ज़मीनी हालात ये है कि अफज़ल और कसाब दोनों बैठ कर नपी हुई कैलोरी युक्त भोजन कर रहे हैं , ये तब भी वैसे ही थे जब कोड़ा जी ने ४००० हज़ार करोड़ का घोटाला किया और  ये तब भी वैसे ही थे जब देश का सबसे बड़ा घोटाला हुआ , माना कि दोनों हिरासत में हैं मगर इतिहास देख कर तो ये नहीं लगता कि अगर कुछ हुआ भी तो जल्दी हो पायेगा और अगर हो भी गया तो तो वो लाखों करोड़ों रुपये वापस कैसे आयेंगे जो इन महानुभावों ने गायब कर लिए ? चलो ये भी मान लेते हैं कि इन पर कठोर से कठोर कार्यवाही कि जाएगी लेकिन भैया कब की जाएगी ये सवाल है . फाइलें यहाँ से वहां , वहां से यहाँ ' ऑफिस ऑफिस ' के इस खेल में वर्षों निकल जाते हैं और १२१ करोड़ 'मुसद्दी लाल' बेचारे बने रहते हैं , 

वैसे भी कहा जाता है कि 'Justice delayed is justice denied' तब लगा कि  ' अन्ना जी का समर्थन करना उचित है , आवश्यक है और अपरिहार्य है , साथ ही अपने स्तर से भी इस पर कार्य करना होगा  , जो हम नैतिकता का पालन कर के और अपने छोटो या जहाँ भी संभव हो नैतिक शिक्षा का प्रसार कर के कर सकते हैं , वरना हुजूर अगर किसी दफ्तर के चपरासी को आप १०० का नोट देते हैं, वो रख लेता है  और आपका काम हो जाता है तो वहां लोकपाल भी कुछ नहीं कर पाएंगे , तो हमारा लक्ष्य GDH ( Gross Domestic Happiness) सकल राष्ट्रीय ख़ुशी होनी चाहिए , साथ ही मन में अपने ' डेमोक्रेसी' को न केवल 'पापुलर' बनाने का संकल्प होना चाहिए बल्कि इसे बनाना है ' The Most Popular Democracy of The World' .