Tuesday, April 19, 2011

'पापुलर डेमोक्रेसी'

भारत एक लोकतान्त्रिक देश है इसमें कोई दोमत नहीं है , और ना ही इस बात को बोलने या स्वीकारने में हमे एक पल का भी समय लगता है , पर क्या लोकतंत्र का मौजूदा स्वरुप लोकप्रिय (व्यापक अर्थों में ) है ? अब इस बात पर हामी भरने में यदि सबको नहीं तो भी बहुत सारे लोगों को थोडा समय लगेगा , अब सवाल ये है की समय क्यों लगे भाई ?? जनता की चुनी हुयी सरकार है ! इसी तंत्र में सैकड़ों कल्याणकारी योजनायें चल रही हैं ! आम आदमी के हित में केंद्र और राज्य स्तर पर महत्त्वपूर्ण और लाभकारी कार्य किये जा रहे हैं ! तो ये 'सिस्टम' 'पापुलर' कैसे नहीं  है ?? अगर नहीं होता तो शायद यहाँ भी ट्यूनीशिया , लीबिया , मिस्र आदि देशो से हालात हो जाते, मगर ऐसा कुछ नहीं है, तो अब ये सिस्टम पापुलर है या नहीं इस पर बाद में बात करेंगे पर बंधुओं  ये तो साबित हो गया की ये 'नान पापुलर' नहीं है ! 

आइये अब इसके दूसरे पक्ष पे बात करते  हैं , मैं आज कल दिल्ली में रह रहा हूँ , सियासी राजधानी है भाई ! काम के सिलसिले में स्थानीय यात्राओं , आम-ओ-खास लोगों से यहाँ वहां मुलाकातों के दौरान कई बार मौजूदा हालात के बारे में चर्चा हो जाती है , अभी तक जो बहुमत (लोकतान्त्रिक शब्दावली) प्राप्त हुआ उसमे लोग कुछ खास प्रसन्न नहीं दिखे , तो बुद्धि चक्कर खाने लगी , कि 'सिस्टम' 'नान पापुलर' नहीं है फिर भी लोगों को संतोष क्यों नहीं है ? एक चर्चा के बाद थोड़ी विवेचना की वही आपके सामने रख रहा हूँ ! 

 लोगों के साथ साथ मुझे भी बड़ी प्रसन्नता हुई कि अन्ना हजारे जी जन लोकपाल के लिए अनशन पे बैठे और सरकार ने तुरंत उनकी बात मान ली , ढोल वोल बजे सब खुश हुए , पर उसी समय एक बात 'क्लिक' हुई कि क्या भ्रष्टाचार का विरोध करने के लिए किसी को जान देने कि नौबत का सामना करना पड़ेगा तब सरकार मानेगी ?? वो भी हमारे द्वारा चुनी हुई सरकार ! मैंने सोचा कि ये जन लोकपाल ज़रूरी क्यों है ? इतनी सशक्त न्यायपालिका है , इतनी सक्रिय जाँच एजेंसियां हैं , इतने सजग लोग हैं ( आर टी आई , पी आई एल आदि के सन्दर्भ में ) और अंतिम में यदि ये भी नहीं तो न्यायपालिका के स्वतः संज्ञान लेने का विशेषाधिकार तो है ही फिर क्या ज़रुरत है इसकी ? तो जवाब भी मन से ही आया , 

एक बार पीछे मुड़ के देखता हूँ तो जवाब मिल जाता है , ये सब तो तब भी ऐसे ही थे जब नरसिम्हा राव कि सरकार बचाई गयी थी , मौजूदा ज़मीनी हालात ये है कि शीबू जी तीन बार मुख्यमंत्री बन चुके हैं फिलहाल आराम कर रहे हैं और बेटे को उप मुख्यमंत्री बनवा दिया है, ये तब भी वैसे ही थे जब संसद और मुंबई पर हमला हुआ था , मौजूदा ज़मीनी हालात ये है कि अफज़ल और कसाब दोनों बैठ कर नपी हुई कैलोरी युक्त भोजन कर रहे हैं , ये तब भी वैसे ही थे जब कोड़ा जी ने ४००० हज़ार करोड़ का घोटाला किया और  ये तब भी वैसे ही थे जब देश का सबसे बड़ा घोटाला हुआ , माना कि दोनों हिरासत में हैं मगर इतिहास देख कर तो ये नहीं लगता कि अगर कुछ हुआ भी तो जल्दी हो पायेगा और अगर हो भी गया तो तो वो लाखों करोड़ों रुपये वापस कैसे आयेंगे जो इन महानुभावों ने गायब कर लिए ? चलो ये भी मान लेते हैं कि इन पर कठोर से कठोर कार्यवाही कि जाएगी लेकिन भैया कब की जाएगी ये सवाल है . फाइलें यहाँ से वहां , वहां से यहाँ ' ऑफिस ऑफिस ' के इस खेल में वर्षों निकल जाते हैं और १२१ करोड़ 'मुसद्दी लाल' बेचारे बने रहते हैं , 

वैसे भी कहा जाता है कि 'Justice delayed is justice denied' तब लगा कि  ' अन्ना जी का समर्थन करना उचित है , आवश्यक है और अपरिहार्य है , साथ ही अपने स्तर से भी इस पर कार्य करना होगा  , जो हम नैतिकता का पालन कर के और अपने छोटो या जहाँ भी संभव हो नैतिक शिक्षा का प्रसार कर के कर सकते हैं , वरना हुजूर अगर किसी दफ्तर के चपरासी को आप १०० का नोट देते हैं, वो रख लेता है  और आपका काम हो जाता है तो वहां लोकपाल भी कुछ नहीं कर पाएंगे , तो हमारा लक्ष्य GDH ( Gross Domestic Happiness) सकल राष्ट्रीय ख़ुशी होनी चाहिए , साथ ही मन में अपने ' डेमोक्रेसी' को न केवल 'पापुलर' बनाने का संकल्प होना चाहिए बल्कि इसे बनाना है ' The Most Popular Democracy of The World' .              

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